vichar

Just another weblog

13 Posts

3238 comments

O.P.Saxena


Sort by:

आग हूं मैं

Posted On: 2 May, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

375 Comments

तीन ग़ज़लें

Posted On: 7 Sep, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Others में

2 Comments

सच कहूं अन्‍ना !

Posted On: 31 Aug, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

345 Comments

एक अन्‍ना, सबकी बात

Posted On: 27 Aug, 2011  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

2 Comments

मां की, नंगी तस्‍वीर बनाने पे खबर बनती है

Posted On: 13 May, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (14 votes, average: 4.14 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

209 Comments

चुराई हुई रचना है बच्‍चन की ‘मधुशाला’

Posted On: 13 Apr, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (23 votes, average: 3.61 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

520 Comments

This is friendship

Posted On: 10 Mar, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

355 Comments

FEW SAYING

Posted On: 22 Feb, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 4.75 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

364 Comments

प्रीत की प्रश्‍नावली

Posted On: 22 Jan, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

186 Comments

The Master

Posted On: 20 Jan, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 3.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

369 Comments

Page 1 of 212»

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

के द्वारा:

पहले इस बात पर----आलोचना करना भारतीयों के खून में है -- यह आदमी के खून में है , विज्ञ जनों का काम है बाल की खाल निकालना ..यदि संतोषानंद ने यह नहीं कहा होता तो आप लोग बच्चान व मधुशाला को भुला ही चुके थे.... हम भारतीय कब अपनी गुलामी वाक्ली मानसिकता से बाहर आकार स्वयं को कोसना बंद करेंगे ... ---- जहाँ तक मधुशाला का प्रश्न है निश्चय ही उमर खय्याम से प्रेरित है... हमारे, सबके..कवि के विचार कहाँ से आते हैं ...अन्य के सुने-पढ़े विचारों से ... उन्हीं को हम अपनी कल्पना अनुभव आदि मिलाकर समाज हेतु प्रतुत करते हैं .....बाल्मीकि की रामायण को तुलसी ने हिन्दी में लिखा ..तो विश्व में हिन्दी,,रामकथा व्यापक होगई ...क्या तुलसी यह नहीं करते... मधुशाला भी इसी प्रकार की कृति है....

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

मिहिर जी, आपकी टिप्पड़ी को पढ़कर ऐसा लगा जैसे कक्षा ५ का बच्चा 'Faithful Friend' पढने के बाद शेक्सपियर की आलोचना वाले मंच पर आ धमका और उसने सारांश सामने रख दिया | पहले थोड़ी पढाई लिखाई कर लो फिर पड़ना साहित्यिक आलोचना में | अधकचरे ज्ञान के साथ दे दी टिप्पड़ी, हो गई न गुगली ! आपके (लघु) शंका का निवारण मैं कर देता हूँ- बह्च्चन साहब अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर थे लेकिन उनकी मात्र भाषा हिंदी थी और मात्र भाषा में कोई भी जयादा अच्छी अभिव्यक्ति कर सकता है | गुरुदेव रबिन्द्र नाथ टैगोर अंग्रेजी माध्यम से पढ़े थे प्रोफेसर नहीं थे फिर भी उन्होंने अंग्रेजी में 'द गीतांजलि' पुन: लिखी जबकि यह उन्होंने पहले बंगला में लिखी थी | खुशवंत सिंह जी पंजाबी हैं लेकिन अंग्रेजी और हिंदी दोनों में बराबर अधिकार के साथ लिखते हैं | अब आपकी (दीर्घ) शंका का निवारण 'आप सच नहीं सच के चक्कइ में उलूल जुलूल लिखते हैं और आपको खुशफहमी होती है कि आप सच कह रहे हैं | आप सिर्फ एक सीदे सादे आत्म-मुग्ध व्यक्ति हैं जो समझता है कि वह अकेला सही और बाकी सारे गलत हैं | ऐसा एक चरित्र साहित्य में है नाम है - सर राजर डी'कावर्ली | जरूर पढियेगा, अच्छा लगेगा..... आपको |

के द्वारा: chaatak chaatak

संतोषानंद जी के लिए मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि वे सस्ती पब्लिसिटी पाने के लिए किसी भी नामी-गिरामी हस्ती पर कीचड न उछालें | बच्चन साहब न तो किसी पहचान के मोहताज़ थे न उम्र खय्याम साहब | श्रीमान कि मधुशाला लिखने के लिए शराब पीना जरूरी नहीं होता बिलकुल वैसे ही जैसे स्त्री की सर्वोत्तम भावनाओं का वर्णन और उनकी अनुभूतियों को लिखने के लिए कबीर या रसखान का स्त्री होना जरूरी नहीं था | हाँ आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि बच्चन साहब अंग्रेजी के विद्वान थे | अगर आप नहीं तो पढो और हैं तो रिवीजन कर डालो एक साहित्यकार के खयालात दुसरे के दिलो-दिमाग में परिमार्जन करके एक लगभग मिलते-जुलते ख्याल पैदा कर देता है जो पूर्ववर्ती से काफी बेहतर और स्पष्ट व् सुग्राह्य भी हो सकता है इसे हम 'Theory of Imitation' कहते हैं | आशा है आप बुरा नहीं मानेंगे !

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: Anuradha Chaudhary Anuradha Chaudhary

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

भाई ओपी जी, बच्चन जी ने कभी शराब को हाथ नहीं लगाया और संतोषानंद जी नशे में डूबे रहते हैं। कवि सम्मेलन में वे इतना पी लेते हैं कि उनके लिए माइक के सामने खड़ा होना मुश्किल होता है। पीकर वे कुछ भी बोल देते हैं। बच्चन जैसे कालजयी रचनाकार पर यह आरोप लगाने से पहले उन्हें अपने गिरेबान में झांकना चाहिए था कि वे क्या हैं? क्या बच्चन पर टिप्पणी करने योग्य हैं? संतोषानंद जी का साहित्यिक अवदान तो कुछ है नहीं, फिल्मों में कुछएक अच्छे गीत लिखने के बाद वहां भी मुकाम नहीं बना सके। वे हमेशा असंतुष्ट रहने वाले लोगों में से हैं। यह सही है कि बच्चन ने मधुशाला उमर खय्याम के साहित्य से प्रभावित होकर लिखी थी, लेकिन वह न तो अनुवाद है और न ही चोरी। मधुशाला उमर ख्य्याम की रुबाइयों से भी बड़ी रचना है। बच्चन उमर खैयाम के दर्शन से प्रभावित होने की बात स्वीकारते भी रहे। बच्चन ने मधुशाला से पहले उमर खैयाम की रुबाइयों का अनुवाद भी किया था, जो अलग पुस्तक के रूप में है, शायद संतोषानंद को यह बात नहीं मालूम। उमर खैयाम की रुबाइयों का काव्यात्मक अनुवाद भी बहुत बेहतर बन पड़ा था, जैसे - उषा ने ले अंगड़ाई हाथ दिए जब नभ की ओर पसार, स्वप्न में मदिरालय के बीच सुनी तब मैंने एक पुकार। अरे ओ शिशुओं नादान बुझा लो पी-पी मदिरा भूख नहीं तो तन प्याली की शीघ्र जाएगी जीवन मदिरा सूख। जबकि मधुशाला में एक अलग तरंग है, उसमें बच्चन के अपने थाट्स हैं। इसे नकल कहने पर संतोषानंद जी की सोच पर तरस आता है। शायद वह बी बेतरह पीना छोड़ दें, तो शायद मधुशाला को समझ सकें। - विवेक भटनागर                                     

के द्वारा:

के द्वारा:

अब न तो बच्चन जी हैं और न ही उमर खैय्याम साहब, फिर भी बखेड़ा ! संतोषानंद जी ने साहित्य और कविताओं के बारे में जो भी कहा वह काफी हद तक सच है. वह वाकई में एक बहुत अच्छे गीतकार हैं, मैंने उनके लिखे गीत सुने हैं, उन्हें कवि सम्मेलनों में भी सुना है. पर संतोषानंद जी ने जो सवाल अब "आपके" सामने उठाया है क्या वो बच्चन जी के जीवित रहते नहीं उठा सकते थे? अब बखेड़ा खड़ा करने से तो लगता है की वह अपना फ्रस्टेशन निकाल रहे हैं. वैसे जिस सम्मान जनक जगह वह हैं वहां पहुँच कर ऐसा करना शोभा नहीं देता. कोई बुजुर्ग साहित्यकार अगर इस बारे में सच्ची जानकारी रखता हो तो उसे सबके सामने सच्चाई रखनी चाहिए ताकि ये बहस ख़त्म हो सके और साहित्य किसी रचनात्मक दिशा ले सके.

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:




latest from jagran